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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

मद्वाक्यार्थैकतत्त्वज्ञ मद्वाक्यार्थैकभावनात् । सुखमाप्नोषि सर्पारिर्यथाभ्ररवभावनात् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

आगे कहे जानेवाले आख्यानरूप मेरे वाक्य के अर्थ का श्रवण पूर्वक बार-बार मनन करना विवेक सेक है । उसीमे सब मनन युक्‍क्तियाँ विद्यमान हैं, ऐसा कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, आप मेरे वाक्यार्थो के एकमात्र तत्त्वज्ञ हैं। जैसे मयूरमेघ के गर्जन की भावना से सुख को प्राप्त होता हे वैसे ही मेरे वाक्यों के अर्थो की एकमात्र भावना से आप भी सुख को प्राप्त होते हैं