Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 43
बयालीसवाँ सर्ग समाप्त तैंतालीसवाँ सर्ग यद्यपि ज्ञान ईश्वर के प्रसाद से लभ्य है तथापि ईश्वर पर भार देना ठीक नहीं ।
35 verse-groups
- Verse 1अपने पौरुष द्वारा इन्द्रियों को वश में करने से ज्ञान प्राप्त होता है, यह वर्णन । श्रीरामच…
- Verse 2जैसे कर्ण भूषण के लिए कानों द्वारा वांछित, गुरु, देवता आदि की प्रसन्नता से पाप दूर करने क…
- Verse 3भगवान्, यदि पौरुष प्रयत्न से ही सब कुछ प्राप्त होता है, तो प्रह्लाद भगवान् के वर के बिन…
- Verse 4अपने पौरुष से सिद्ध होनेवाली पुरुषार्थ सिद्धि में भगवान् का वर भी द्वार विशेष ही है स्वत…
- Verse 5अथवा विष्णु से प्रह्मादात्मा का भेद न होने के कारण आत्मप्रयत्न से प्राप्त वह प्रह्लाद प्र…
- Verse 6अथवा कार्य और कारण उपाधि का त्याग करने पर विशिष्ट चिन्मात्र का अभेद है ही । इस प्रकार लक्…
- Verse 7पहले प्रह्नाद नामक आत्मा ही स्वयं अपने द्वारा अपनी परम शक्ति से विष्णु भक्ति में नियोजित…
- Verse 8स्वात्मभूत विष्णु से ही प्रह्लाद ने स्वयं इस वर का उपार्जन किया । अपने मन को स्वयं ही विच…
- Verse 9कभी स्वात्मभूत विष्णु द्वारा ही आत्मा अपने प्रयत्न से किये गये विचार के बल से स्वयं प्रबु…
- Verse 10अन्वय से प्रदर्शित अर्थ को व्यतिरेक के दर्शन द्वारा भी दृढ़ करते हैं। चिरकाल से आराधित भी…
- Verse 11"तुम्हे आत्मज्ञानपर्यन्त विचार प्राप्त हो इस प्रकार वर दे रहे भगवान् हरि को पुरुष प्रयत्…
- Verse 12(जिस विषय में प्रयत्न करने से विचारोदय होता है, उसे दशती हैं।) इसलिए दसों इन्द्रियो को जब…
- Verse 13कहीं पर किसी के द्वारा जो कुछ भी पाया जाता है वह अपने यत्न से प्रयुक्त शुभाचरण से ही पाया…
- Verse 14पौरुष प्रयत्न का अवलम्बन कर इन्द्रियरूप पर्वत को लाँघधकर संसाररूप सागर को पार कर परम पद क…
- Verse 15यदि पौरुष प्रयत्न के बिना भगवान् विष्णु का दर्शन हो, तो ये भगवान् मृग और पक्षियों का क्…
- Verse 16गुरुजी शिष्य के प्रयत्न के बिना ही शक्तिपात आदि द्वारा शिष्य का उद्धार करते हैं यह योगशास…
- Verse 17ज्ञान की दृढ़ता से बाधित मनवाले अपने आत्मा से जो परमपुरुषार्थरूप परमपद प्राप्त किया गया,…
- Verse 18अभ्यास और वैराग्य से युक्त आत्मा से जिसने इन्द्रियरूपी साँपों को अपने वश में कर लिया है,…
- Verse 19हे वत्स, तुम अपने आत्मा को यह उत्कृष्ट है, यह समझकर श्रवण आदि से अपने-आप सिद्ध करो तथा सि…
- Verse 20यदि अपने प्रयत्न से उत्पन्न विचार से ही ज्ञान उदय होता है, तो शास्त्रों में विष्णु भगवान्…
- Verse 21पूर्वोक्त अर्थ को युक्तयो से दृढ़ करते हैं। शास्त्र में अभ्यास और प्रयत्न पहले मुख्य विधि…
- Verse 22यदि इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली गई, तो पूजनों से क्या फल प्राप्त है ? यदि इन्द्रियों…
- Verse 23विचार ओर उपशम के बिना पूणनिन्द आत्मा स्वतन्त्ररूप से तत्त्वतः प्राप्त नहीं होता विचार ओर…
- Verse 24विचार ओर उपशम से युक्त अपने चित्त को प्रसन्न करो । उसके प्रसन्न होने पर आप परम पुरुषार्थर…
- Verse 25जैसे विष्णु आदि देवताओं की विनय प्रार्थना स्वयं की जाती है, वैसे ही अपने ही चित्त की प्रण…
- Verse 26इन सभी लोगों के अन्दर भगवान् विष्णु स्थित हैं। उनका परित्याग करके जो बाह्य आराधना करते ह…
- Verse 27हृदयरूपी गुहा में निवास करनेवाला चित्-तत्त्व ही आत्मा का (विष्णु का) मुख्य शाश्वत स्वरूप…
- Verse 28जो मुख्य आकार का त्याग कर गौण रूप का अनुसरण करता है वह, सिद्ध अमृत का त्याग कर साध्य धान…
- Verses 29–30तब बाह्य विष्णु भक्ति का अधिकारी कौन है ? ऐसा प्रश्न होने पर उसे कहते हैं। हे वत्स रघुनन्…
- Verses 31–32हे श्रीरामचन्द्रजी, परमेश्वर के पूजन से, वैराम्यकारी क्लेशप्रद तपस्या से उसका चित्त बहुत…
- Verses 33–35नित्य के अभ्यास और विचार से चित्त बहुत जल्दी निर्मल हो जाता है। आम ही धीरे-धीरे पुष्प, फल…
- Verse 36जो अमित तेजवाले विष्णु से वरदान पाता है। उसने भी अपने ही अभ्यास रूपी वृक्ष का वह फल प्राप…
- Verses 37–38तब तक मनुष्य हजारों जन्मों तक संसार में भटकते रहते हैं जब तक कि मनरूपी मत्त महासागर प्रशा…
- Verse 39ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, रुद्रादि देवाधिदेव चिरकाल तक पूजित हों और दया भी करते हों, फिर भ…
- Verse 40हे श्रीरामचन्द्रजी, आप बाह्य और आभ्यन्तर विषयों से निर्मुक्त, निरामयैकसंविन्मय, स्वयं निर…