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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 43, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 43, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । भगवन्सर्वधर्मज्ञ शुद्धैस्त्वद्वचनांशुभिः । निर्वृताः स्म शशाङ्कस्य करैरोषधयो यथा ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने पौरुष द्वारा इन्द्रियों को वश में करने से ज्ञान प्राप्त होता है, यह वर्णन । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे सब धर्मो के ज्ञाता, हे भगवान्‌, जैसे चन्द्रमा की किरणों से औषधियाँ आह्लादित होती हैं वैसे ही स्फटिक के समान शुद्ध आपके वचनरूपी किरणों से हम आहलादित हुए हैं

सर्ग सन्दर्भ

बयालीसवाँ सर्ग समाप्त तैंतालीसवाँ सर्ग यद्यपि ज्ञान ईश्वर के प्रसाद से लभ्य है तथापि ईश्वर पर भार देना ठीक नहीं ।