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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 43, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 43, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

आत्मा नारायणश्चैव न भिन्नस्तिलतैलवत् । तथैव शौक्ल्यपटवत्कुसुमामोदवत्तथा ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा विष्णु से प्रह्मादात्मा का भेद न होने के कारण आत्मप्रयत्न से प्राप्त वह प्रह्लाद प्रयत्न से ही बोध को प्राप्त हुआ, ऐसा यहाँ पर परिहार हो सकता है, इस आशय से कहते हैं। जैसे तिलों के अन्तर्गत और तिलों से निकाला हुआ तेल भिन्न नहीं है वैसे ही आत्मा और नारायण भिन्न नहीं है। जैसे शुक्लता (कपास) ओर वस्त्र भिन्‍न नहीं हैं वैसे ही आत्मा और नारायण भिन्न नहीं हैं और जैसे फूलों का सार सुगन्ध है वैसे ही जीवों का परमार्थ सार विष्णु हैं, इसलिए भी उनमें अभेद जानना चाहिये