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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 45

चौवालीसवाँ सर्ग समाप्त पैंतालीसवाँ सर्ग मन का कार्य कभी सच्चा नहीं होता, कारण कि मनोरथ आदि में ऐसा देखा गया है; इसलिए मनोमय होने के कारण जगत असत्‌ है, सत्‌ ही सत्‌ है, यह वर्णन ।

45 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा यह जगत स्थित होता हुआ कुछ भी स्थित नहीं है, क्योकि मन का विलासमात्र य…
  2. Verse 2प्रतिभास से अतिरिक्त वह शून्य कैसे है ? ऐसा यदि कोई के, तो उस पर कहते है । इस परिच्छिन्न…
  3. Verse 3पर्व ओर उत्तर देश और काल से व्याप्ति तो दूर रही अपने आश्रयभूत (वर्तमान) देश और काल में भी…
  4. Verse 4अतएव यह गन्धर्वनगर के चित्र के तुल्य है, ऐसा हमने पहले कहा है । ऐसा कहते हैं । रंगों से र…
  5. Verse 5सब देहादि तीनों भुवन मन से ही कल्पत हैं। जैसे देखने में चक्षु कारण है वैसे ही इनके स्मरण…
  6. Verses 6–7दीवारआदिरूप जगत सत्‌ से अलग करके दिखलाया नहीं जा सकता। इसलिए भी सत्‌ से पृथक्रूप से उसकी…
  7. Verse 8चित्त की संकल्पमात्र से असत्रचना प्राप्त करने की शक्ति प्रसिद्ध है, इसलिए भी पूर्वोक्त अर…
  8. Verse 9जिन शक्तियों से मन रूपी गुहाएँ अन्दर प्राप्त नहीं होती, वे शक्तियाँ सर्वशक्तिशाली जगदीश्व…
  9. Verse 10यदि सदा ही यह जगत असत्‌ है तथा ब्रह्म सदा ही सत्‌ है ओर उनका परस्पर स्पर्श नहीं है, तो जग…
  10. Verse 11वह यह ईश्वर की सर्वशक्ति है, इसका अपने मन में ही प्रत्यक्ष दर्शन किया जा सकता है, ऐसा कहत…
  11. Verse 12इसलिए देवादिशक्तियों द्वारा भी मुक्ति का प्रतिरोध नहीं किया जा सकता, ऐसा कहते हैं। देवता,…
  12. Verses 13–15हे महामते, इस सम्पूर्ण जगत को आकाश तुल्य, अपनी कल्पनामात्र से विकसित, उत्पन्न हुए दीर्घस्…
  13. Verse 16अपने शरीर से मूँज से ईषिका की तरह पृथक्‌ किये हुए भूमारूप को परमार्थदृष्टि से अपने अन्तःक…
  14. Verse 17जैसे मरुभूमि में सूर्य की किरणों से मृगजल दिखाई देता हे वैसे ही मन के संकल्प से असत्य सब…
  15. Verse 18मनोरथ की नाई तथा दो चन्द्रमाओं के विभ्रम के तुल्य मिथ्याज्ञान से पूर्ण ये सब दृश्याकार रा…
  16. Verse 19जैसे नौका से यात्रा कर रहे लोगों की मिथ्या ही स्थाणु में चलन प्रतीति होती है वैसे ही दृश्…
  17. Verse 20माया से जिसका पिंजर रचा गया है, मन के मनन से ही जिसका निर्माण हुआ है, ऐसे इस दृश्य को आप…
  18. Verse 21यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है। इसलिए भेद का प्रसंग किस प्रमाण से, किसके प्रकार का, कौन और…
  19. Verse 22यह पर्वत है, यह स्थाणु है और यह उनके अन्तरालवर्ती आडम्बरों का विलास है। ये सब मन की भावना…
  20. Verse 23विचारहीन पुरुष की काम तृष्णा मननरूप यह जगत स्वर्ग, नरक, तिर्यग्‌ आदि योनियों में पतन का आ…
  21. Verse 24जैसे बड़े-बड़े आरम्भों से पूर्ण स्वप्न भ्रम ही है, वास्तविक नहीं है वैसे ही चित्त द्वारा…
  22. Verse 25दृश्यमान अवस्थावाला बहुत विस्तीर्ण अतएव रमणीय-सा वस्तुतः तुच्छ आशारूपी सर्पो का बिलरूप इस…
  23. Verse 26यह असत्‌ है, यह जानकर इससे प्रम न कीजिये । विद्वान पुरुष "यह मृगजल है” यह जानकर उसके पीछे…
  24. Verse 27जो मूढ पुरुष अपने संकल्प से स्वरूपयुक्त हुई मनोरथमयी राजलक्ष्मी के तुल्य इस जगत का अनुसरण…
  25. Verse 28इसके अनुगमन से केवल अनर्थ ही प्राप्त नहीं होते, किन्तु पुरुषार्थ का नाश भी होता है, ऐसा क…
  26. Verse 29जैसे रस्सी में सर्प का भय मन का व्यामोह ही है वैसे ही यह भी मन का व्यामोह ही है । एकमात्र…
  27. Verse 30जल के भीतर चन्द्रप्रतिबिम्ब के तुल्य क्षणभंगुर मिथ्या उदित हुए पदार्थों से इस लोक में बाल…
  28. Verse 31जो पुरुष शब्दादिगुणों के समूहरूप इस देह आदिकी भावना करता हुआ अर्थात्‌ देह आदि में अहं, मम…
  29. Verses 32–33यह जड़ संघात देह आदिरूप विशाल जगत हृदय में मन के संकल्प से निर्मित विशाल नगर के समान असत्…
  30. Verse 34यदि यह ऐच्छिक संकल्प से उत्पन्न हुआ है, तो ऐच्छिक निवृत्ति के संकल्प से क्यो नहीं निवृत्त…
  31. Verses 35–36हृदय मेँ मन से कल्पित विशाल नगर के खण्डहर हो जाने पर और वृद्धि को प्राप्त होने पर भला बतल…
  32. Verse 37जैसे खेल के लिए गुड़िया आदि द्वारा पुत्र, पशु, आदि व्यवहाराभास की कल्पना बालकों के मन में…
  33. Verse 38जो असत्‌ हे, वह यदि अविद्यमान ही हो जाय, तो किसका क्या बिगड़ा ? अर्थात्‌ कुछ भी नहीं । इस…
  34. Verse 39इस प्रकार नाश के स्वीकार द्वारा शोक की अयोग्यता कहकर वस्तुतः नाश ही किसी का नहीं है, ऐसा…
  35. Verse 40अध्यस्त दृष्टि से नाश के असंभव का उपपादन कर अधिष्ठान दृष्टि से भी उसका उपपादन करते है । अ…
  36. Verses 41–42उत्पत्ति का खण्डन करने से वृद्धि आदि विकारों का भी खण्डन हो ही गया, इसलिए तन्निमित्तक हर्…
  37. Verse 43इष्ट पदार्थ की प्राप्ति में हर्ष होता है । मायामय जगत में इष्ट पदार्थ ही नहीं है, ऐसा कहत…
  38. Verse 44जिसकी दृष्टि में जगत असत्य है अथवा जिसकी दृष्टि में जगत सत्य है दोनों पक्षों में भी उसका…
  39. Verse 45असत्‌ और सत्‌ पक्षों में समान उपपत्ति दिखलाते हैं। आदि और अन्त में जो नहीं है, वर्तमान मे…
  40. Verse 46आदि ओर अन्त में जो सत्य है, वर्तमान में भी वह सत्‌ ही है, जिसकी सब सत्‌ ही है, ऐसी मति हो…
  41. Verse 47देश और काल से परिच्छिन्न पदार्थो की सत्यता की कल्पना, जो जगत को सत्‌ ओर असत्‌ माननेवाले प…
  42. Verse 48मूर्ख ही विशाल आकारवाले, अर्थशून्य सुखाभासों से अपने असीम दुःख के लिए सन्तुष्ट होता हे, न…
  43. Verse 49इसलिए हे कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी, आप मूर्ख मत बनिये। विचार करके अविनाशी नित्य ओर सुस्थिर प…
  44. Verse 50आदि विषाद की प्राप्ति न हो
  45. Verse 51श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : मुनि के ऐसा कहने पर दिन बीत गया। सूर्य अस्ताचल को चले गये । सभा म…