Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
मनोव्यामोह एवेदं रज्ज्वामहिभयं यथा ।
भावनामात्रवैचित्र्याच्चिरमावर्तते जगत् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे रस्सी में सर्प का भय मन
का व्यामोह ही है वैसे ही यह भी मन का व्यामोह ही है । एकमात्र भावनाओं की विचित्रता से यह जगत
चिरकाल तक प्राप्त होता हे