Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verses 41–42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, verses 41–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
असद्वापि यदत्यन्तं वृद्धिः स्यात्तस्य कीदृशी ।
वृद्धेरभावे हर्षस्य कः प्रसङ्गो महामते ॥ ४१ ॥
सर्वत्रासत्यभूतेऽस्मिन्प्रपञ्चैकान्तकारिणि ।
संसारे किमुपादेयं प्राज्ञो यदभिवाञ्छतु ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्पत्ति का खण्डन करने से वृद्धि आदि विकारों का भी खण्डन हो ही गया, इसलिए तन्निमित्तक
हर्ष भी ठीक नही है, ऐसा कहते है ।
जो अत्यन्त असत् है उसकी वृद्धि कैसी ? वृद्धि का अभाव होने पर तो हे महाबुद्धि श्रीरामचन्द्रजी,
हर्ष का कौन अवसर हे ?