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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

असत्यभूतं तोयान्तश्चन्द्रव्योमतलादिकम् । बाला एवाभिवाञ्छन्ति मनोमोहाय नोत्तमाः ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

देश और काल से परिच्छिन्न पदार्थो की सत्यता की कल्पना, जो जगत को सत्‌ ओर असत्‌ माननेवाले पूर्वोक्त दोनो रूपों से बहिष्कृत है ओर सब श्रुति ओर युक्‍क्तियों से विरुद्ध है । अन्धपरस्परा द्वारा सहय्रों मूर्खो ने जिसकी कल्पना कर रक्खी है ओर जो सम्पूर्ण अनर्थो की मूल है, उन्ही मूर्खोकि योग्य है । आपके योग्य नहीं है, ऐसा कहते है । जल के अन्दर के असत्य स्वरूप चन्द्रमा ओर आकाशतल आदि को अपने मन के मोह के लिए मूर्ख ही चाहते हैं, आप जैसे उत्तम लोग नहीं चाहते