Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

न किंचित्कस्यचिन्नष्टमिन्द्रजालजले यथा । भ्रष्टे नष्टे तथैवास्मिन्संसारे वितथोत्थिते ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे खेल के लिए गुड़िया आदि द्वारा पुत्र, पशु, आदि व्यवहाराभास की कल्पना बालकों के मन में होती है वैसे ही यह जगत भी मन से ही निरन्तर उदित होता है, उसके लिए शोक करना उचित नहीं है ॥ ३ ६॥ जैसे इन्द्रजाल के जल के नष्ट-भ्रष्ट होने पर किसी का कुछ भी नष्ट नहीं होता