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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

असत्सद्वा जगद्यस्य तेनासौ सुखदुःखयोः । अगम्य एव मूर्खस्तु तद्विनाशेन दुःखितः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसकी दृष्टि में जगत असत्य है अथवा जिसकी दृष्टि में जगत सत्य है दोनों पक्षों में भी उसका विनाश न हो सकने के कारण वह पुरुष सुख और दुःख का अगम्य यही हे । किन्तु मूर्ख तो पुत्र, मित्र आदि के विनाश से, जो कि अपनी भ्रान्ति से कल्पित है, दुःखी होता है