Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
स्वसंकल्पात्स्वरूपाढ्यां मनोरथमयीं श्रियम् ।
योऽनुगच्छति मूढात्मा दुःखस्यैव स भाजनम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो मूढ पुरुष अपने संकल्प से
स्वरूपयुक्त हुई मनोरथमयी राजलक्ष्मी के तुल्य इस जगत का अनुसरण करता है, वह एकमात्र दुःख
का ही पात्र होता हे