Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अभित्तिरागरचनमपि दृष्टमसन्मयम् ।
अकृतं कृतमेवैतद्व्योम्नि चित्रं विचित्रकम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव यह गन्धर्वनगर के चित्र के तुल्य है, ऐसा हमने पहले कहा है । ऐसा कहते हैं ।
रंगों से रचा गया फिर भी भित्तिरहित, देखा गया फिर भी असन्मय, नहीं रचा गया फिर भी रचा
हुआ-सा यह आकाश में अद्भुत चित्र हे