Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

न देशकालावेतेन ब्रह्माण्डेनावृतौ स्थितौ । मनागपि महारूपवताप्याकाशरूपिणा ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रतिभास से अतिरिक्त वह शून्य कैसे है ? ऐसा यदि कोई के, तो उस पर कहते है । इस परिच्छिन्न ब्रह्माण्ड से प्रतिभासरूप देश ओर काल व्याप्त नहीं है, क्योकि अतीत, भावी बाहर स्थित अनेक ब्रह्माण्ड कोटियो का जैसे धूप में परमाणु घूमते है वैसे ही, प्रतिभास के अन्दर भ्रमण दिखाई देता हे । ओर तो ओर जो आकाश परम महत्त्वरूप से प्रसिद्ध है उससे भी वे व्याप्त नहीं है, क्योकि “ज्यायानाकाशात्‌" ऐसी श्रुति हे