Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अयं गिरिरयं स्थाणुरित्याडम्बरविभ्रमः ।
मनसो भावनादार्ढ्यादसन्सन्निव लक्ष्यते ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
यह पर्वत है, यह स्थाणु
है और यह उनके अन्तरालवर्ती आडम्बरों का विलास है। ये सब मन की भावना की दृढ़ता से असत्
होते हुए भी सत्-से प्रतीत होते हैँ