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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

सर्वत्र सत्यभूतेऽस्मिन्ब्रह्मतत्त्वमयेऽपि च । किं स्यात्र्त्रिभुवने हेयं प्राज्ञाः परिहरन्तु यत् ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

इष्ट पदार्थ की प्राप्ति में हर्ष होता है । मायामय जगत में इष्ट पदार्थ ही नहीं है, ऐसा कहते है। सर्वत्र असत्यभूत, एकमात्र प्रपंचकारी इस संसार में क्या उपादेय है, जिसे विद्वान पुरुष चाहे ॥ ४ २॥ इसी प्रकार जो पुरुष सबको आनन्दरूप से देखता है, उसको हेय भी कुछ नहीं है, ऐसा कहते हैं। सर्वत्र सत्यरूप, ब्रह्मत्वमय इस त्रिभुवन में कौन पदार्थ हेय हे, जिसका विद्वान लोग त्याग करें