Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 32
इकतीसवाँ सर्ग समाप्त बत्तीसवाँ सर्ग मछली ओर सारस के जन्म की प्राप्ति से वियुक्त हुए दाम आदि की राजमहल में मच्छर आदि के शरीरों में ज्ञान प्राप्त कर मुक्ति का वर्णन ।
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- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिवर, बालकों के यक्ष ओर पिशाच की नाई अज्ञानियों की दृष्टि स…
- Verse 2श्रीवसिष्टजी ने कहा : हे श्री रामचन्द्रजी ! दाम, व्याल और कट के बान्धवरूप उन यम किकरो ने…
- Verse 3जब ये दाम आदि वियोग को प्राप्त होंगे और शम्बर की माया से कल्पित जीवभावरूपता तथा वासनारहित…
- Verse 4श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, वे अपने इस वृत्तान्त को कहाँ, कब कैसे और किससे सुन…
- Verses 5–6श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, काश्मीर देश में बड़ेभारी कमलों के तालाब के तीर…
- Verses 7–10वहाँ पर श्वेत कमल की पंक्तियों से युक्त भाँति- भाँति के कमलों की श्रेणियों में, सुन्दर से…
- Verse 11उक्त काश्मीर देश के मध्य में पर्वतो ओर वृक्षों से सुशोभित बड़ा सुन्दर अधिष्ठान नाम का नगर…
- Verses 12–15जैसे कमल के बीच में कर्णिका होती है वैसे ही उस नगर के मध्य मे प्रद्युम्न शिखर नाम का लाँघ…
- Verse 16उसी समय उस महल मेँ स्वर्ग में दूसरे इन्द्र के समान श्रीयशस्कार नाम का राजा होगा
- Verse 17दाम नाम का दानव उसी राजा के महल में विशाल स्तम्भ की पीठ के छेद में मृदु ध्वनिवाला मच्छर ह…
- Verse 18उसी अधिष्ठान नाम के नगर के अन्दर उस समय रत्नावली विहार नाम का विहार (क्रीडागृह) भी होगा
- Verse 19उसमें उस राजा का मन्त्री रहेगा, जो नरसिंह नाम से विख्यात होगा ओर जिसे बन्ध ओर मोक्ष श्रुत…
- Verse 20मायामय असुर कट उस मन्त्री के घर में उसका क्रीडा साधन एक मैनारूप होगा, चाँदी के पिंजडे मे…
- Verse 21राजमन्त्री वह नरसिंह श्लोकों से रची गई, दाम, व्याल ओर कट आदि की यह उत्तम कथा कहेगा
- Verse 22उस मैनारूपधारी कट का, जिसे उस कथा को सुनकर अपरिच्छिन्न आत्मा का स्मरण हो जायेगा, शम्बर द्…
- Verse 23प्रद्युम्न नामक शिखर के एक प्रदेश में रहनेवाला गौरिया वहाँ पर रहनेवाले लोगों के मुँह से उ…
- Verse 24राजमहल के स्तम्भरूप लकड़ी की दरार में रहनेवाला मच्छर भी प्रसंगवश लोगों द्वारा कही जा रही…
- Verse 25इस प्रकार हे श्रीरामचन्द्रजी, प्रद्युम्न शिखर से गौरिया, राजमहल से मच्छर ओर रत्नावली विहा…
- Verse 26हे श्रीरामचन्द्रजी, मैंने आपसे इस प्रकार यह दाम, व्याल ओर कट की कथा का क्रम सम्पूर्ण कहा…
- Verse 27हे श्रीरामचन्द्रजी, इससे मोहित हुए मूढ लोग दाम, व्याल ओ कटकी नाई अज्ञानवश अन्यान्य पदों क…
- Verses 28–32निवसिनिकता से प्राप्त पूर्वजन्म के उत्कर्षं की अपेक्षा पीछे के मच्छर आदि जन्म का बड़ा भार…
- Verse 33अब राजस अहंकार से चिदाकाश के देहादि के आकार का अभिमान प्रकार दिखाते है। चिदाकाश भे" इस प्…
- Verse 34जैसे जल गड्ढे की ओर जाते हैं वैसे ही जो नाना दुःख देनेवाले शुष्क तार्किक मतों की ओर जाते…
- Verse 35ओपनिषद मार्ग के साथ अपने अनुभव का भी संवाद है, तार्किक मतों के साथ अनुभव का संवाद नहीं, ऐ…
- Verse 36किससे तव पुरुषार्थ का विनाश होता है ? इस पर कहते हैँ । हे महामते, यह मेरे हो, यह मुझे प्र…
- Verse 37इस प्रकार अभिलाषा की अनर्थकारिता कह कर वैराग्य की सर्वअनर्थनिवर्तकता कहते है । जो उदार पु…
- Verse 38विरक्त पुरुष को यदि थोड़ी भी ज्ञान कणिका प्राप्त हो, तो उसकी आपत्तियाँ तो दूर हुई, बल्कि…
- Verse 39घोर आपत्ति में भी कुमार्ग में पैर रखना ही नहीं चाहिये । देखिये न, अनुचित रीति से अमृतपान…
- Verse 40जो पुरुष उपनिषदादि सत्शास्त्र ओर उनके अनुसार चलनेवाले साधु-सज्जन पुरुषों के सर्म्पकरूपी स…
- Verses 41–43जिसने गुणों के द्वारा यश प्राप्त किया, वश में न आनेवाले प्राणी भी उसके वशीभूत हो जाते हैं…
- Verse 44अव जगत के हितैषी पिता-माता से भी बढ़कर आप्त श्रीवलिष्ठजी अनादि संसार में पुनःपुनः सब अनर्…
- Verse 45अपने अधिकार के अनुसार, उक्त अधिकारी की चित्तशुद्धि के अनुकूल शास्त्र के अनुसार ओर पहले-पह…
- Verse 46स्वर्ग तक प्रसिद्ध हुए गुणों से प्राप्त हुई कीर्ति से साधु जनों के मुख से वाहवाही लेना चा…
- Verse 47अप्सरा जिनके चन्द्रमा के समान शुभ्र यश का आकाश के समान सब देश ओर काल में व्याप्त गीतों से…
- Verse 48किस प्रकार यश का सम्पादन किया जा सकता है ? इस पर कहते हैं। परमपौरुष-यत्न का अवलम्बन कर, स…
- Verse 49शास्त्रानुसार कार्य कर रहे पुरुष को सिद्धियों के लिए त्वरा नहीं करनी चाहिए, क्योकि चिरकाल…
- Verse 50शोक, भय ओर क्लेश को त्याग कर शीघ्रता के आग्रह को छोडकर शास्त्रानुसार व्यवहार करना चाहिए अ…
- Verse 51प्रचुर पदार्थो मेँ आसक्तिवाले आप लोगों का जीव इस समय इन्द्रियरूपी रस्सी से मानों मृत्यु क…
- Verses 52–53इस समय से लेकर फिर नीचे से नीचे आप मत जाईये । सैकड़ों तीक्ष्ण बाणो से जिसमें हाथी काटे गय…
- Verse 54ग्रीष्म ऋतु मे उबले हुए तालाब के दुर्गन्धपूर्ण कीचड़ के सदृश संसार में पुनःपुनः मरकर जीवि…
- Verse 55विषयाकार वृत्ति में प्रतिबिम्बत चिदाभासो का अन्तःकरण अवच्छिन्न चैतन्य बिम्ब है और अन्तःकर…
- Verse 56इस प्रकार शास्त्रार्थ के विचार का विधान कर अब जीवन, धन, पशु, पुत्र आदि सांसारिक विचार की…
- Verse 57जैसे बूढ़ा कछुआ तालाब में सोया रहता हे, वैसे सोये रहना ठीक नहीं है । जरा, मरण आदि दुःखों…
- Verse 58धनसम्पत्ति अनर्थो की जननी हे ओर विविध भोग संसाररूपी रोग के हेतु हे । आपत्तियाँ ही सब सम्प…
- Verse 59लोकव्यवहारी पुरुषों के विचार से लोकव्यवहार के अविरोधी तथा शास्त्र ओर सदाचार के अनुकूल कर्…
- Verse 60जिसका चरित्र सदाचार से सुन्दर है, बुद्धि विवेकशील है ओर संसार के सौख्यफलरूपी दुःखदशाओं मे…