Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, Verses 7–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, verses 7–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 7-10
संस्कृत श्लोक
तत्र कह्लारमालासु सरोजपटलीषु च ।
शैवालवरवल्लीषु तरङ्गवलनासु च ॥ ७ ॥
चलत्कुसुमदोलासु नीलोत्पललतासु च ।
सीकरौघाभ्रलेखासु शीतलावर्तवर्तिषु ॥ ८ ॥
सारसाः सरसंभोगान्भुक्त्वा भुवनभूषणाः ।
विहृत्य सुचिरं कालमलमागतशुद्धयः ॥ ९ ॥
ते वियुक्ता भविष्यन्ति मुक्तये लब्धबुद्धयः ।
रजःसत्त्वतमांसीव भेदं प्राप्य यदृच्छया ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर श्वेत कमल की पंक्तियों से युक्त भाँति-
भाँति के कमलों की श्रेणियों में, सुन्दर सेवाल की लताओं में, तरंगों में, हिल रहे फूलरूपी झूलों से
युक्त नील कमल की लताओं में तथा शीतल आवर्तो मेँ स्थित अतएव जलबिन्दुओं को बरसा रही
मेघपंक्तियों मे विविध सरस भोगों को भोग कर बहुत दिनों तक खूब विहार कर शुद्ध हुए भुवनभूषण वे
सारस जैसे विवेकदुष्ट से पर्यालोचित होने पर सत्व, रज ओर तम मुक्ति के लिये भेद को प्राप्त होते हैं
वैसे ही विचारबुद्धि को प्राप्त हो स्वेच्छा से मुक्ति के लिये विवेक को प्राप्त कर विमुक्त होगे