Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, Verses 41–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, verses 41–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 41-43
संस्कृत श्लोक
ये श्रयन्ते न ते यान्ति मोहान्ध्यस्य पुनर्वशम् ।
अवश्या वश्यतां यान्ति यान्ति सर्वापदः क्षयम् ॥ ४१ ॥
अक्षयं भवति श्रेयः कृतं येन गुणैर्यशः ।
येषां गुणेष्वसंतोषो रागो येषां श्रुतं प्रति ॥ ४२ ॥
सत्यव्यसनिनो ये च ते नराः पशवोऽपरे ।
यशश्चन्द्रिकया येषां भासितं जन्तुहृत्सरः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसने गुणों के द्वारा यश प्राप्त किया, वश में न आनेवाले प्राणी भी
उसके वशीभूत हो जाते हैं, सब आपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और अक्षय कल्याण प्राप्त हो जाता
है । जिनका गुणों के विषय में सन्तोष (अहंबुद्धि) नहीं है, जिनका शास्त्र के प्रति अनुराग है ओर
जो सत्य के व्यसनी हैं, वे ही वस्तुतः नर है, उनसे अतिरिक्त निरे पशु हे । जिनके यशरूप चन्द्रमा
की चाँदनी से प्राणियों का हृदयरूपी सरोवर प्रकाशित है, क्षीरसमुद्ररूप उनके शरीर में निश्चित
भगवान हरि का निवास है