Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, Verse 54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
जीवमुद्रा च किं पङ्के भोगगन्धो निरस्यताम् ।
किमर्थमात्रया कार्यमार्याः शास्त्रमवेक्ष्यताम् ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
ग्रीष्म ऋतु मे उबले हुए तालाब के दुर्गन्धपूर्ण कीचड़ के
सदृश संसार में पुनःपुनः मरकर जीवित हुए बूढ़े मेढक के समान जीने की आशा क्या है ! यानी अति
तुच्छ है, इसलिए हृदय से भोगवासना हटा देना चाहिए । भोग के उपायभूत धन की क्या आवश्यकता हे,
इसलिए हे श्रेष्ठ पुरुषों, इन सबका त्याग कर मोक्षशास्त्र का ही अवलोकन कीजिये