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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

तेषां क्षीरसमुद्राणां नूनं मूर्तौ स्थितो हरिः । भुक्तं भोक्तव्यमखिलं दृष्टा द्रष्टव्यदृष्टयः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

अव जगत के हितैषी पिता-माता से भी बढ़कर आप्त श्रीवलिष्ठजी अनादि संसार में पुनःपुनः सब अनर्थ परम्यराओ के फलों के साथ अनुभूत विषयो में और दृश्य कौतुको में कुछ भी अपूर्व वस्तु अवशिष्ट नहीं है, यह दशति हुए एवं वैराग्य ओर शास्त्रीय आचार मे निष्ठा की ही प्रशंसा करते हुए उनकी ओर जनता को अभिमुख करते है । भोक्तव्य सब वस्तुओं का भोग कर लिया, दृष्टव्य वस्तुएँ देख ली । आगे होनेवाले जन्मों में अपने विनाश के लिए फिर भी भोगों में लालच करना क्या ठीक है ?