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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, Verses 12–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, verses 12–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 12-15

संस्कृत श्लोक

प्रद्युम्नशिखरं नाम तस्य मध्ये भविष्यति । श्रृङ्गं लघु सरोजस्य कोशचक्रमिवोदरे ॥ १२ ॥ तस्य मूर्ध्नि गिरेर्गेहं कश्चिद्राजा भविष्यति । अभ्रंकषमहाशालं श्रृङ्गे श्रृङ्गमिवापरम् ॥ १३ ॥ गृहस्येशानकोणेऽस्ति शिरोभित्तिव्रणोदरे । तस्यानिशमविश्रान्तवाताधूततृणान्तिके ॥ १४ ॥ आलये दानवो व्यालः कलविङ्को भविष्यति । प्रथमाल्पश्रुतशास्त्र इवार्थरहितारवः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे कमल के बीच में कर्णिका होती है वैसे ही उस नगर के मध्य मे प्रद्युम्न शिखर नाम का लाँघन योग्य छोटा शिखर होगा, उस पर्वत के शिखर पर अन्य घरों के राजा के समान कोई घर होगा, उसकी आकाश को छूनेवाली अड्टालिका होगी, अतएव वह पर्वत के शिखर पर स्थित दूसरे शिखर के समान होगा । उस घर के ईशान कोण में ऊँची दीवार की दरार में एक घोंसला है, निरन्तर बह रहे वायु से उसके आस-पास के तृण हिलाये जाते हैं, ऐसे अपने घोंसले में व्याल नामक दानव गौरिया बनेगा, जिसने पहले थोडा-सा शास्त्र पढ़ा हो, ऐसे ब्राह्मण के समान उसकी ची-ची कूची आदि ध्वनि अर्थ रहित होगी