Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, Verses 28–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, verses 28–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 28-30
संस्कृत श्लोक
पतन्ति मोहिता मूढा दामव्यालकटा इव ।
क्व भ्रूक्षेपविनिष्पिष्टमेरुमन्दरसद्मता ॥ २८ ॥
क्व राजगृहदार्वन्तर्व्रणे मशकरूपता ।
क्व चपेटभुजामात्रपातितार्केन्दुबिम्बता ॥ २९ ॥
क्व प्रद्युम्नगिरौ गेहे भित्तिव्रणविहङ्गता ।
क्व पुष्पलीलया लोलकरतोलितमेरुता ॥ ३० ॥
क्व वा श्रृङ्गे नृसिंहस्य गृहे क्रकरपोतता ।
चिदाकाशोऽहमित्येव रजसा रञ्जितप्रभः ॥ ३१ ॥
स्वरूपमत्यजन्नेव विरूपमपि बुध्यते ।
स्वयैव वासनाभ्रान्त्या सत्ययेवाप्यसत्यया ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
निवसिनिकता से प्राप्त पूर्वजन्म के उत्कर्षं की अपेक्षा पीछे के मच्छर आदि जन्म का बड़ा भारी
अन्तर दिखलाते है ।
कहाँ भ्रुकुटि मात्र से मन्दिर ओर मेरु के घरों को चूर-चूर करना, कहाँ राजा के महल के स्तम्भ
की दरार में मच्छररूप से रहना, कहाँ हाथ के थप्पड़ से सूर्य और चन्द्रमा के बिम्बो के गिराने की
सामर्थ्य, कहाँ प्रद्युम्न नाम के शिखर में स्थित घर की दीवार की दरार में गोरिया बन के रहना, कहाँ
फूल के समान चंचल हाथ से मेरु को तौलना, कहाँ पर्वत के शिखर पर नरसिंह के घर में मैना का
बच्चा बनके रहना ?