Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 10
नौवाँ सर्ग समाप्त दसवाँ सर्ग पुत्र का शरीर देखने से भूगुजी का कालके प्रति क्रोध तथा काल का आत्मविद्या से भृगुजी को बोधित करना ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर देवताओं के हजार वर्ष बीतने पर भगवान भ…
- Verses 2–3उन्होने विनय से अवनत, सैकड़ों सद्गुणो के आकार, मूर्तिमान पुण्यके सदुश पुत्र श्री शुक्र को…
- Verses 4–5उक्त नर कंकाल का ही वर्णन करते है। धूप से उसका शरीर सूख कर कटा हो गया था, उसके चमड़े के छ…
- Verses 6–7वह कंकाल वर्षा की धाराओं से धोई हुई अँतड़ी से और खूब सूखी हुई हड्डियों की माला से भला और…
- Verse 8वह सीधी गर्दन से, जिसकी नसे सूख गई थी, एक मात्र हद्ै शेष रह गई थी एवं जो वासना से व्याप्त…
- Verse 9वह कमल की जड के तुल्य सफेद नासिका के अग्रभाग की छोटी हड्डी से, जिसका कि वृष्टि धाराओं से…
- Verse 10वह कंकाल ऊँची गर्दन से, जिसने उसके मुँह को ऊँचा किया था, मानों आकाश में उठे हुए प्राणपखेर…
- Verse 11दीर्घं परलोकमार्ग के परिश्रम से उसे भय था, अतएव फूल कर दुगने हुए आठ अंगों से जाँघ, घुटनों…
- Verse 12अत्यन्त रिक्त, सूखे हुए एवं चमड़ा ही जिसमें शेष है, ऐसे उदर से अज्ञानी के हृदय की शून्यता…
- Verse 13अपने दुःखरूपी हाथी के बन्धनस्तम्भ के तुल्य उस सूखे हुए कंकाल को देखकर पूर्वापर का विचार न…
- Verse 14तदनन्तर पुत्र के कंकाल को देखते ही भृगु के मन में तुरन्त यह वितर्कं उत्पन्न हुआ किं क्या…
- Verse 15अवश्यम्भावी वस्तु का विचार न कर रहे महर्षि भृगु को पुत्र को मरा देखकर तुरन्त कालके प्रति…
- Verse 16हे क्रूर काल, अकाल में ही तुमने मेरे पुत्र को क्यों मारा ? यों कुपित हुए भगवान भृगु काल क…
- Verse 17मुनिजी के शाप देने के लिए उद्यत होने पर लोगों को कवलित करनेवाला रूपरहित भी यह काल आधिभौति…
- Verses 18–20उसकी शोभा अद्भुत थी, उसके हाथ में खड्ग ओर पाश था, वह कुण्डलों से विभूषित था ओर कवच पहने थ…
- Verse 21उसके तेज श्वासवायु से छिन्न-भिन्न शिखरवाले हुए पर्वत झूले में बैठे हुएकी तरह इधर-उधर झूलत…
- Verse 22उसके तलवार के मण्डल की चमक से काला हुआ सूर्य का प्रतिबिम्ब प्रलयकाल में जले हुए जगत के धु…
- Verse 23हे महावाहो श्रीरामचन्द्रजी, वह काल कुपित हुए भूगुजी के पास आकर प्रलयकाल में क्षुब्ध हुए स…
- Verse 24हे मुनिजी, लोक की मर्यादा को जाननेवाले एवं पूर्वापर व्यवहारों को देखे हुए उत्तम लोग दूसरे…
- Verse 25भगवन्, आप महातपस्वी ब्राह्मण हैं। हम नियम का पालन करनेवाले हैं, हे साधो, आप पूज्य हैं, इ…
- Verse 26हे बुद्धिरहित > मुनिजी, आप तप का नाश न कीजिये जो मैं प्रलयकालरूपी महाग्नियों से भी नहीं ज…
- Verses 27–28हमने संसार की पंक्तियों की पंक्तियाँ निगल डाली हैं, करोड़ों रुद्र चवा डाले हैं, एक नहीं,…
- Verse 29हे ब्रह्मन्, हम लोग भोक्ता हैं और आप लोग हमारे भोजन हैं, यह स्वाभाविक मर्यादा है । इच्छा…
- Verses 30–31यदि कोई प्रश्न करे कि आपकी यह सर्वभोक््तृता कहाँ से आई और आपका क्या स्वरूप है तो उस पर क…
- Verses 32–33यह भी ओपनिषदव्यवहार दृष्टि से कहा है, परमार्थद्ष्टि से तो कहते हैं। गः बुद्धि के ज्ञान से…
- Verse 34“न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः (भगवान मनुष्यों के कर्तृत्व ओर शुभाशुभ कर्मों…
- Verse 35जैसे दूषित दृष्टिवाला पुरुष रस्सी में सर्पत्व की कल्पना करता है वैसे ही मन ने मिथ्याभ्रम…
- Verses 36–37हे मुनिजी, पूर्वोक्त रीति से मेरे अपराध का संभव न होने से आप व्याकुल होकर कोप न कीजिये। आ…
- Verse 38राग, अभिमान आदि के कारण यदि मैंने आपके पुत्र का विनाश किया होता तो वैसी स्थिति में मुझमें…
- Verse 39व्यवहारचतुर पुरुषों को अपनी-अपनी उचित मर्यादा का अवश्य पालन करना चाहिये । आप तमोवृत्ति का…
- Verse 40आपकी वह ज्ञानमयी दृष्टि कहाँ, वह महत्त्व कहाँ, वह धैर्य कहाँ ? सब प्राज्ञ पुरुषों के परिच…
- Verse 41हे मुनिजी, अपने कर्म के फल की परिणामरूप दशा का विचार न करके हे सर्वज्ञ, मूर्ख की नाई आप म…
- Verse 42हे मुनिजी, आप क्या नहीं जानते हैं कि यहाँ पर सब प्राणियों के दो प्रकार के शरीर होते हैं |…
- Verse 43उनमेंसे देह अत्यन्त जड और थोड़े से भी निमित्त से नष्ट होनेवाला है एवं मन मोक्ष तक स्थिर र…
- Verses 44–45हे सज्जनशिरोमणे, जैसे अभिमान से कुछ कर रहे चतुर सारथि द्वारा रथ चलाया जाता हे वैसे ही अभि…
- Verses 46–49इस लोक में चित्त ही पुरुष है उसका किया हुआ ही कृत कहा जाता हे । वह चित्त असत् संकल्परूप…
- Verse 50मन की यह देह आदि कल्पना आत्म- साक्षात्कार तक ही होती है, उसके बाद नहीं होती, ऐसा कहते हैं…
- Verses 51–54इस प्रकार भगु को ज्ञानोपदेश देकर एकमात्र मनोविलास से किये गये उनके पुत्र के वृत्तान्त को…
- Verses 55–57स्वर्ग की तरह पुण्य के क्षय से स्वर्ग से पतन भी मन की कल्पना से ही हुआ, इस आशय से कहते है…
- Verses 58–61पहले वह दशार्ण देश में ब्राह्मण हुआ | तदनन्तर कोसल देश में वह राजा हुआ | उसके बाद महाटवी…
- Verses 62–63फिर विन्ध्य पर्वत में वह किरात हुआ, तदनन्तर कैकट नगर में किरात हुआ। किरात योनि के वाद सौव…
- Verses 64–65हे मुनिजी, आपके इस पुत्र ने मन्त्रवेत्ताओं में सर्वश्रेष्ठ होकर विद्याधर नगर में पहुँचाने…
- Verse 66दूसरे कामदेव की नाई नायिकारूपी नलिनियों को प्रकाशित करनेवाला विद्याधरियों का अत्यन्त प्रि…
- Verses 67–70कल्परूपी अवधि को प्राप्त कर प्रलयकाल के एक साथ उदित हुए बारह आदित्यो की ज्योति में जसे पत…
- Verses 71–72हे मुनिजी, वह ब्राह्मण का कुमार वासुदेवनाम से उत्पन्न हुआ, विद्वान लोगों के बीच में उसने…
- Verse 73मुने, वह जिस जगत में विविध विषयों की वासना ओं के अनुवर्तन से खैर और करोदे के कोटो से भीषण…