Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 44–45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 44,45
संस्कृत श्लोक
चतुरेण यथा साधो रथः सारथिनोह्यते ।
कुर्वता किंचन स्नेहाद्देहोऽयं मनसा तथा ॥ ४४ ॥
असत्संकल्पः क्रियते सच्छरीरं विनाश्यते ।
क्षणेन मनसा पङ्कपुरुषः शिशुना यथा ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे सज्जनशिरोमणे, जैसे अभिमान से कुछ कर रहे चतुर सारथि द्वारा रथ चलाया
जाता हे वैसे ही अभिमान से “इस प्रकार का" यों विशेषरूप जो नहीं कहा जा सकता, ऐसे आभ्यन्तर
व्यापार को कर रहे मन द्वारा यह शरीर चलाया जाता हे । जैसे बच्चा कच्चे मिट्टी के खिलौने को, जो
विद्यमान नहीं है, बनाता है और पहले से बने हुए का नाश करता है वैसे ही यह मन असत् (अविद्यमान)
देह का संकल्प करता है और पूर्व विद्यमान देह का नाश करता है