Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 4–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 4,5

संस्कृत श्लोक

तापशुष्कवपुः कृत्तिरन्ध्रस्फुरिततित्तिरि । संशुष्कान्त्रोदरगुहाछायाविश्रान्तदर्दुरम् ॥ ४ ॥ नेत्रगर्तकसंसक्तप्रसूतनवकीटकम् । पर्शुकापञ्जरप्रोतकोशकारकृमिव्रजम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त नर कंकाल का ही वर्णन करते है। धूप से उसका शरीर सूख कर कटा हो गया था, उसके चमड़े के छेदों मेँ तीतर फुदक रहे थे, उदररूपी गुहा की, जिसकी अंतिं सूख गई थी, छाया में मेंढक आराम कर रहे थे, आँखों के गड़ों में नये-नये कीड़े सटे थे, बच्चे देने से उनकी संख्या कहीं अधिक बढ़ गई थी ओर पसलीरूपी पिंजड़े में मकड़ियों के दल के दल गुँथे थे