Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 32–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
कर्तृताकर्तृते ब्रह्मन्केवलं परिकल्पिते ।
असम्यग्दर्शनेनैव न सम्यग्दर्शनस्य ते ॥ ३२ ॥
पुष्पाणि तरुखण्डेषु भूतानि भुवनेषु च ।
स्वयमायान्ति यान्तीह कल्पते हेतुनामभिः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
यह भी ओपनिषदव्यवहार दृष्टि से कहा है, परमार्थद्ष्टि से तो कहते हैं।
गः बुद्धि के ज्ञान से बाधित होने के कारण हे अबुद्धे यानी हे अविद्यमान बुद्धे यों मुनि की प्रशंसा ही की है ।
कलंकरहित दृष्टि से (परमार्थदृष्टि से) न तो यहाँ कोई कर्ता है और न कोई भोक्ता है, किन्तु
कलंक युक्त दुष्टि से (कर्मकाण्डियों की दृष्टि से) यहाँ पर बहुत से कर्ता हैं ॥३ १॥ हे ब्रह्मन्, कर्तृत्व
और अकर्तृत्व असम्यग् दृष्टि पुरुष से केवल कल्पित हैं। आपको तो तत्त्वसाक्षात्कार हो चुका हे ।
आपकी दृष्टि में कर्तृत्व और अकर्तृत्व हैं ही नहीं