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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

स्वयमूर्ध्वं प्रयात्यग्निः स्वयं यान्ति पयांस्यधः । भोक्तारं भोजनं याति सृष्टिं चाप्यन्तकः स्वयम् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे ब्रह्मन्‌, हम लोग भोक्ता हैं और आप लोग हमारे भोजन हैं, यह स्वाभाविक मर्यादा है । इच्छा, द्वेष आदि किसी अन्य निमित्त से हम लोगों का यह भोग्य- भोक्तृत्व व्यवहार नहीं है॥ २ ८॥ अग्नि अपने-आप ऊपर की ओर चलती है जल स्वभावतः नीचे की ओर बहता है, भोजन स्वभावतः भोक्ता के पास आता है और विनाशकाल भी जितने जन्य पदार्थ हैं उनके पास स्वभावतः आता है