Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 46–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, verses 46–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 46-49
संस्कृत श्लोक
चित्तमेवेह पुरुषस्तत्कृतं कृतमुच्यते ।
तद्बद्धं कलनाहेतोः कलनास्तं विमुच्यते ॥ ४६ ॥
अयं देह इवात्रस्थमिदमङ्गमिदं शिरः ।
इदं स्फारविकारं तन्मन एवाभिधीयते ॥ ४७ ॥
मनो हि जीवाज्जीवाख्यं निश्चयैकतया नु धीः ।
अहङ्कारोऽभिमन्तृत्वान्नानाता स्वयमेव हि ॥ ४८ ॥
देहवासनया चेतस्त्वन्यानि स्वानि चेच्छया ।
पार्थिवानि शरीराणि ह्यसन्ति परिपश्यति ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस लोक में चित्त ही पुरुष
है उसका किया हुआ ही कृत कहा जाता हे । वह चित्त असत् संकल्परूप कल्पना से बद्ध है कल्पना का
विनाश होने पर विमुक्त हो जाता हे । मन की देह कल्पना इस प्रकार है : “यह देह है, इसमें स्थित यह
अंग है, यह सिर है", यों विविध विकारों से वह मन ही इन रूपों में कहा जाता है । मनही पूर्व जीव से
अन्य जीव की संज्ञावाला होता है। (एक ही मन जैसे पूर्वपूर्व जीव से अन्य जीव की संज्ञावाला होता है
वैसा जीवटोपाख्यान में कहा जायेगा ।) उसके बाद मन से संकल्पित अर्थ में निश्चय होने से मन बुद्धि
होता है। मन ही अभिमान करने के कारण अहंकार होता है । इस प्रकार मन स्वयं ही नानात्व को प्राप्त
होता है। मन देह की वासना से अन्य या अपने पार्थिव शरीरों को, जो कि विद्यमान नहीं है, इच्छा से
देखता हे