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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verse 38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

प्रकृतव्यवहारेहानियतीर्निंयतेर्वशात् । प्राज्ञाः समभिवर्तन्ते नाभिमानमहातमः ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

राग, अभिमान आदि के कारण यदि मैंने आपके पुत्र का विनाश किया होता तो वैसी स्थिति में मुझमें अपराधिता हो सकती थी, पर वे मुझमें हैं ही नहीं, ऐसा कहते हैं । हे पूज्य, भ्रान्ति से कल्पित ख्याति, पूजा आदि में अनुराग रखनेवाले हम लोग नहीं हैं और न अभिमान के ही वशीभूत हैं । आपके समीप में हमारा आगमन भी आपके क्रोध के भय से नहीं हुआ है किन्तु तपस्वियों का सम्मान करना चाहिए इस नियम के कारण ही हुआ है, हे तात, हम स्वयं भी अपने वश में नहीं हैं केवल नियति के वशमें स्थित हैं ॥ ३ ७॥ मेरी नियति की वशवर्तिता उचित है, क्योकि सव प्राज्ञ पुरुष उसका अनुसरण करते हैं ओर आपको क्रोध, अभिमान ओर अज्ञान का वशवर्ती होना उचित नहीं है, इस आशय से कहते है। सब प्राज्ञ पुरुष जगत की मर्यादा के पालक ईश्वर की इच्छारूप महानियति के बल से आन्तर प्रकृतव्यवहारेच्छारूप नियति का अनुवर्तन करते हैँ, अभिमानरूप महातम का अनुवर्तन नहीं करते