Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 62–63
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, verses 62–63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 62,63
संस्कृत श्लोक
अभूद्विन्ध्यनगे भूयः किरातः कैकटेषु च ।
सौवीरेष्वथ सामन्तस्त्रिगर्तेषु च गर्दभः ॥ ६२ ॥
वंशगुल्मः किरातेषु हरिणश्चीनजङ्गले ।
सरीसृपस्तालवृक्षे तमाले वनकुक्कुटः ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
फिर विन्ध्य पर्वत में वह किरात हुआ, तदनन्तर कैकट नगर में किरात हुआ। किरात
योनि के वाद सौवीर देशमें वह सामन्त राजा हुआ। उस योनि में किये गये पापों से उसे तिर्यक्, स्थावर
आदि अनेक जन्म भोगने पड़े, सामन्त होने के बाद त्रिगर्त देश में गधा हुआ । किरात देश में बाँस की
कोठी हुआ । चीन के जंगल में हरिण हुआ, फिर ताड के वृक्ष में साँप हुआ । तमाल के वृक्ष में मृग
हुआ