Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 58–61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, verses 58–61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 58-61
संस्कृत श्लोक
आसीद्विप्रो दशार्णेषु कोसलेषु महीपतिः ।
धीवरोऽथ महाटव्यां हंसस्त्रिपथगातटे ॥ ५८ ॥
सूर्यवंशे नृपः पौण्ड्रः सौरशाल्वेषु देशिकः ।
कल्पं विद्याधरः श्रीमान्धीमानथ मुनेः सुतः ॥ ५९ ॥
मद्रेष्वथ महीपालस्ततस्तापसबालकः ।
वासुदेव इति ख्यातः समङ्गायास्तटे स्थितः ॥ ६० ॥
अन्यास्वपि विचित्रासु वासनावशतः स्वयम् ।
विषमास्वेव पुत्रस्ते चचारान्तरयोनिषु ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले वह दशार्ण देश में
ब्राह्मण हुआ | तदनन्तर कोसल देश में वह राजा हुआ | उसके बाद महाटवी में वह धीवर हुआ ।
धीवरयोनि के उपरान्त वह गंगाजी के तट पर हंस हुआ। तदनन्तर सूर्यवंश में पौँड् देश का राजा हुआ ।
सौरशाल्व देश में दूसरों को उपदेश देनेवाला मन्त्र सिद्ध हुआ । एक कल्प तक वह सुन्दर विद्याधर
हुआ । तदनन्तर वह सुन्दर बुद्धिमान मुनिपुत्र वासुदेव इस नाम से प्रसिद्ध समंगा नामक नदी के तट पर
स्थित रहा । वासनावश और भी विचित्र और विषम अन्यान्य योनियों में आपका पुत्र भ्रमण करता
रहा