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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 51–54

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, verses 51–54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 51-54

संस्कृत श्लोक

तन्मनस्तव पुत्रस्य समाधौ त्वयि संस्थिते । स्वमनोरथमार्गेण दूराद्दूरतरं गतम् ॥ ५१ ॥ इममौशनसं त्यक्त्वा देहं मन्दरकन्दरे । प्रयातो वैबुधं सद्म नीडोड्डीनः खगो यथा ॥ ५२ ॥ तत्र मन्दरगुञ्जेषु पारिजाततलेषु च । नन्दनोद्यानखण्डेषु लोकपालपुरेषु च ॥ ५३ ॥ मुने चतुर्युगान्यष्टौ विश्वाचीं देवसुन्दरीम् । असेवत महातेजाः षट्पदः पद्मिनीमिव ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार भगु को ज्ञानोपदेश देकर एकमात्र मनोविलास से किये गये उनके पुत्र के वृत्तान्त को कहते हैं। आपके समाधि में स्थित होने पर आपके पुत्र का मन अपने मनोरथ के मार्ग से बहुत दूर चला गया । वह इस भार्गव शरीर का मन्दराचल की कन्दरा मे त्यागकर स्वर्ग में ऐसे चला गया जैसे कि घोंसले से उड़ा हुआ पक्षी आकाश में जाता हे । हे मुनिजी, वहाँ पर मन्दराचल के निकुंजों में, पारिजात वृक्षों के तले, नन्दनवन के उद्यानों में और लोकपालोंके नगरों मे महातेजस्वी आपके पुत्र ने आठ चौकड़ी तक विश्वाची नामक अप्सराओं का ऐसे सेवन किया जैसे भ्रमर पद्मिनी का सेवन करते हैं