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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 2–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 2, 3

संस्कृत श्लोक

नापश्यदग्रे तनयं विनयावनताननम् । सामन्तं गुणसेनायाः पुण्यं मूर्तमिव स्थितम् ॥ २ ॥ अपश्यत्केवलं कायकङ्कालं पुरतो महत् । देहयुक्तमिवाभाग्यं दारिद्र्यमिव मूर्तिमत् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

उन्होने विनय से अवनत, सैकड़ों सद्गुणो के आकार, मूर्तिमान पुण्यके सदुश पुत्र श्री शुक्र को अपने आगे नहीं देखा किन्तु उन्होने पुत्रके बदले अपने आगे देहधारी दुभग्य के सदृश तथा मूर्तिमान दारिद्रय के तुल्य शुक्राचार्य का केवल महान देहपंजर (शव) देखा