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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 55

चौवनवाँ सर्ग समाप्त पचपनवाँ सर्गं आदि सृष्टि से लेकर जीव की विचित्र संसारगतियों का तथा जीवकमनुसारी ईश्वर की स्थिति का वर्णन |

51 verse-groups

  1. Verses 1–2प्रबुद्ध लीला ने कहा : हे देवेशि, जैसे जन्तु (प्राणी) मरता है और जैसे फिर पैदा होता है, उ…
  2. Verse 3वस्तुतः चेतना कहीं शान्त नहीं होती है, ऐसा कहते हैं । चेतन मल के सम्पर्क से रहित तथा नित्…
  3. Verse 4इससे यह सिद्ध हआ कि मरण देह का धर्म है, आत्मा का धर्म नहीं है, ऐसा मानते हैं । प्राणवायु…
  4. Verse 5जब यह देह मुर्दा बन जाती है, प्राणवायु अपने कारणरूप महावायु में लीन हो जाता है, तब वासनार…
  5. Verse 6जाता है, वस्तुतः जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है अतएव वासनावश उसको अपने स्थान में ही परलोक गम…
  6. Verses 7–8देह के मरण से ही लौकिक व्यवहार करनेवाले लोग उसे प्रेत कहते हैं । चेतन वासनाओं से युक्त हो…
  7. Verse 9उसी भ्रम को नये सिरे से क्रमश: कहना आरम्भ करते हैं। उसी प्रदेश के अन्दर पूर्व जन्म की नाई…
  8. Verses 10–12यदि कोड कहे कि छोटे से मरण-प्रदेशर्में यथा कथंचित्‌ अन्य शरीर की कल्पना हो सकने पर भी दूर…
  9. Verse 13उनमें से पहले और तीसरे की गति कहते है। कोई बड़ा भारी पातकी एक वर्ष तक मरणमूर्छा का अनुभव…
  10. Verses 14–15बहुत समय के बाद चेतना को प्राप्त होकर चिरकाल तक वासनारूपी नायिका के उदर से उत्पन्न होकर क…
  11. Verses 16–17अथवा वे मृत्यु-मोह के अन्त में सैकड़ों जड-दुःखों से व्याकुल वृक्ष आदि योनियों का, जो कि उ…
  12. Verses 18–19मध्यम पापी की गति को कहते हैं। और जो मध्यम पापी है, वह मरणमूर्छा के पश्चात्‌ पत्थर के उदर…
  13. Verse 20साधारण पापी की गति बतलाते हैं। कोई साधारण पापी मरते ही अपनी वासनाओं के अनुसार प्राप्त हुए…
  14. Verse 21वह स्वप्न की नाई ओर मनोरथ की नाई, वैसा अनुभव करता है और उसी क्षण में उसकी स्मृतियाँ (जैसा…
  15. Verses 22–23सर्वश्रेष्ठ महापुण्यात्माओं की गति कहते हैं । किन्तु जो सर्वश्रेष्ठ महापुण्यात्मा हैं, वे…
  16. Verses 24–25मध्यम धर्मात्माओं की गति कहते हैं। जो मध्यम धर्मात्मा हैं, वे मरणमूर्च्छा के बाद आकाश-वाय…
  17. Verse 26इससे साधारण धर्मात्मा की भी गति प्रायः कही गई, ऐसा मानते हुए उपसंहार करते है । प्रेत अपनी…
  18. Verses 27–28अब उनका मरण आदि अध्यारोपक्रम विशेषरूप से दशाति हैं । प्रेत पहले हम लोग मरे, तदनन्दर दाह,…
  19. Verse 29उनमें से जो महापुण्यवान होते हैं, वे वड़े मनोहर देवलोक के विमान और उद्यानों को “ये हमारे…
  20. Verse 30महापापी पुरुष बर्फ की चट्टानें, कटि, गङ्के ओर तलवार की नाई तीक्ष्ण पत्तों से भरपूर वन, जो…
  21. Verse 31मध्यम पुण्यवाले पुरुष जानते हैँ कि यह मार्ग, जिसमें बडे आनन्द के साथ पैदल चला जा सकता हे,…
  22. Verse 32मध्यम पापीजनों को यह अनुभव होता है कि यह मैं यमपुरी में आ पहुँचा, ये सर्वलोकप्रसिद्ध यमरा…
  23. Verse 33यह अध्यारोपक्रम स्वप्न के समान प्रत्येक पुरुष का भिन्न भिन्न है, ऐसा कहते हैँ । जैसे प्रत…
  24. Verses 34–36परमार्थद्रष्टि से यदि देखा जाय, तो आत्मा से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । आकाश की नाई स्वरूपर…
  25. Verse 37“मुझे यमराज ने अपने कर्मों के फलों का भोग करने के लिए इस दिशा में जाने की आज्ञा दी है, इस…
  26. Verses 38–39यदि किसीको शंका हो तो उस समय उसे अपने व्रीह्मयादिभाव का अनुभव क्यो नहीं होता ? इस पर कहते…
  27. Verse 40तदुपरान्त वह चन्द्रमा के समान घटने बढ़नेवाले चंचल ओर मनोहर तथा कामोन्मुख (नारीपरायण) यौवन…
  28. Verse 41उसका इलने में छुटकारा नहीं होता, उसके बाद भी व्याधिरूपी मरण का अनुभव करता है फिर वह मरणजन…
  29. Verse 42फिर वह पूर्वोक्त रीति के अनुसार यमलोक में जाता है, फिर वैसे ही विविध योनियों की प्राप्ति…
  30. Verse 43आकाश में आकाशरूपी जीव इस प्रकार के वेगवान परिवर्तन का मोक्ष होने तक पुनः पुनः अनुभव करता…
  31. Verse 44त्वं पदार्थ जीव में भ्रान्ति हो सकती है, इसलिए उसमें भले ही यह अध्यारोपक्रम हो, तत्पवार्थ…
  32. Verse 45ईश्वर की भ्रान्ति से जगत्‌ का अध्यारोप नहीं होता, किन्तु परमार्थघन ईश्वर का ही माया अध्या…
  33. Verses 46–47सर्वस्वरूप होने के कारण उस चिदात्मा परमेश्वर का जहाँ पर जैसा विवर्त होता ह, परमाकाश शुद्ध…
  34. Verse 48यदि यह माना जाय कि संकल्प से उत्पन्न हुई जगत्सत्ता से यह जगत्सत्ता भिन्न है, तो इस पक्ष म…
  35. Verses 49–50जगत्सृष्टि में स्थावर- जंगम विभाग जैसे हुआ, उसमें निमित्त कहती है । देहो का जो छिद्र स्था…
  36. Verse 51इसी प्रकार चेतन और अचेतन के विभाग की कल्पना करने में भी निमित्त कहती है । यह चिदाकाश ही (…
  37. Verse 52उसका बुद्धि के द्वारा स्थूल में प्रवेश और स्थूल में चक्षु आदि की प्राप्ति होने से बाह्य व…
  38. Verse 53बुद्धि ही जीव की उपाधि है, अन्य नहीं है, इस नियममें तो सम्पूर्ण पदार्थो की शक्ति का व्यवस…
  39. Verse 54इस प्रकार सर्वात्मक चेतन ही जंगमरूप से जंगम का (चरका) और स्थावररूप से स्थावरका (अचर का) स…
  40. Verse 55इसलिए जो जंगम्‌ जगत्‌ है, उसको उसने अपने संकल्प के अनुसार जैसा जाना वैसा ही वह आज तक स्थि…
  41. Verses 56–57जिन वृक्ष, शिला, पेड़-पौधों, तृण आदि को स्थावररूप से जड़ जाना, वे आज भी वैसे ही स्थित हैं…
  42. Verse 58यदि कोई कहे कि सब वस्तु केवल चिदेकरस ही है, फिर उसमें उससे विरुद्ध जाज्य, रूप, नाम आदि भे…
  43. Verses 59–60प्रत्यक्‌ चैतन्य ही उक्त स्थावर, आदि बुद्धि के "मेँ स्थावर हूँ” यों व्यवस्थित रूप से अन्द…
  44. Verses 61–62जैसे उत्तर सागर के तीर में निवास करनेवाले लोग दक्षिण सागर के किनारे पर रहनेवाले लोगों के…
  45. Verses 63–65इस प्रकार सच्चित्रूप ब्रह्म में असत्त्व, जाञ्व, वायु, आकाश आदि की कल्पना की भी उपपत्ति हो…
  46. Verse 66(चेष्टाएँ) होते हैं और स्थावर में नहीं होते
  47. Verse 67इस नियम में भी पूर्वकथित नियति ही हेतु है, ऐसा कहते हैं । भ्रान्तिमय विश्व में इस प्रकार…
  48. Verses 68–69प्रस्तुत विषय को कहने के लिए पूर्वपृष्ठ प्रसंगप्राप्त तत्त्वज्ञान का उपसंहार करते हैं। सम…
  49. Verse 70प्रबुद्ध लीला ने कहा : हे देवी, किस मार्ग से यह शवमण्डप में जाता है, इसको देखती हुई ही हम…
  50. Verses 71–72श्री देवीजी ने कहा : भद्रे, पद्मशरीर में "अहम्‌" वासनारूप अन्तःकरण में स्थित मार्ग का अवल…
  51. Verse 73श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, श्रेष्ठ राजा की पुत्री लीला के विशुद्ध हृदय में पर…