Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 22–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
ये तूत्तममहापुण्या मृतिमोहादनन्तरम् ।
स्वर्गविद्याधरपुरं स्मृत्या स्वनुभवन्ति ते ॥ २२ ॥
ततोऽन्यकर्मसदृशं भुक्त्वान्यत्र फलं निजम् ।
जायन्ते मानुषे लोके सश्रीके सज्जनास्पदे ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वश्रेष्ठ महापुण्यात्माओं की गति कहते हैं ।
किन्तु जो सर्वश्रेष्ठ महापुण्यात्मा हैं, वे मरणजनित मूर्खा के बाद पुण्य वासना के उदय से
स्वर्गलोक, विद्याधरलोकका सुख भोगते हैं । महापुण्य के फल के उपभोग के बाद थोड़ा-बहुत
पापकर्म यदि हो, तो उसके अनुरूप फल को इलावृत्त, किंपुरुष आदि खण्डों में भोगकर
मनुष्य लोक में सज्जनों के धनवान् घर में जन्म लेते हैं