Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
तथा खं खं तथा भूमिर्भूमित्वेनाप्त्ववज्जलम् ।
यद्यथा चेतति स्वैरं तद्वेत्त्येव तथा वपुः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
बुद्धि ही जीव की उपाधि है, अन्य नहीं है, इस नियममें तो सम्पूर्ण पदार्थो की शक्ति का
व्यवस्थापक चित्तका संकल्प ही कारण है, इस आशय से देवीजी कहती हैं।
आकाश शून्यता शक्ति से युक्त होकर स्थित हे, पृथिवी सब पदार्थों को धारण करने की
शक्ति से स्थित है, जल सब पदार्थों को तर करने की शक्ति से युक्त है। तात्पर्य यह कि
चितिशक्ति स्वेच्छा से जिसका जैसा संकल्प करती है, वह अपने शरीर को वैसा ही जानता
है