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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 68–69

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verses 68–69 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 68,69

संस्कृत श्लोक

यथा विश्वपदार्थानां स्वभावस्य विजृम्भितम् । असत्यमेव सत्याभं तदेतत्कथितं तव ॥ ६८ ॥ अयमस्तं गतः प्रायः पश्य राजा विदूरथः । मालाशवस्य पद्मस्य पत्युस्ते याति हृद्गतम् ॥ ६९ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रस्तुत विषय को कहने के लिए पूर्वपृष्ठ प्रसंगप्राप्त तत्त्वज्ञान का उपसंहार करते हैं। सम्पूर्ण पदार्थ स्वभाव के विलास और असत्य होने पर भी जैसे सत्य-से प्रतीत होते हैं, वह सब मैंने तुमसे कह दिया हे । देखो मैं समझती हूँ कि यह राजा विदूरथ मरकर फूलों की माला से आच्छादित शवभूत राजा पद्म के हृदय में स्थित पद्मकोश में प्रवेश करनेकी इच्छा से जाता है