Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 71–72
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verses 71–72 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 71, 72
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
मनुष्यवासनान्तस्थं मार्गमाश्रित्य गच्छति ।
एषोऽहमपरं लोकं दूरं यामीति चिन्मयः ॥ ७१ ॥
मार्गेणैवमनेनैव यावस्तेयेन संमतम् ।
परस्परेच्छाविच्छित्तिर्न हि सौहार्दबन्धनी ॥ ७२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्री देवीजी ने कहा : भद्रे, पद्मशरीर में
"अहम्" वासनारूप अन्तःकरण में स्थित मार्ग का अवलम्बन कर यह चिन्मय “मेँ दूसरे लोक में
जाता हूँ“, ऐसी भावना से जाता है| जिस मार्ग से जाना तुम्हें सहमत हो, उसी मार्ग से हम
दोनों जाती हैं, एक दूसरे की इच्छाका विघात स्नेह-सम्बन्ध का हेतु नहीं होता है