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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

श्रीदेव्युवाच । परमार्थघनं शैलाः परमार्थघनं द्रुमाः । परमार्थघनं पृथ्वी परमार्थघनं नभः ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

ईश्वर की भ्रान्ति से जगत्‌ का अध्यारोप नहीं होता, किन्तु परमार्थघन ईश्वर का ही माया अध्यारोपित रूप से विवर्त होता है । अनावृत चैतन्य को जो अध्यस्त का भान होता है, वह भ्रम नहीं है, किन्तु असत्य की सत्यरूप से प्रतीति भ्रम है । सर्वज्ञ होने के कारण ईश्वर को सदा पदार्थो की प्रतीति होने पर भी उनमें सत्यताकी प्रतीति नहीं होती, क्योंकि वे ईश्वर के प्रति स्वस्वरूप के परिज्ञानरूप बोध से बाधित रहते है । इस प्रकार तत्पदार्थ मे अध्यारोप होने से कोई दोष नहीं है, इस आशय से देवी तत्पदार्थ मे अध्यारोप का उपपादन करती है । पर्वत परमार्थघन चैतन्य हैँ, वृक्ष परमार्थघन हैं, पृथिवी परमार्थघन हे ओर आकाश परमार्थघन है