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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 73

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verse 73 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 73

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इति विहितकथागतक्लमायां परमदृशि प्रसृते विबोधभानौ । नृपतिवरसुतामनस्युदारे विगलितचित्तजडो विदूरथोऽभूत् ॥ ७३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, श्रेष्ठ राजा की पुत्री लीला के विशुद्ध हृदय में परमार्थदृष्टिरूप आत्मतत्त्व के पूर्वोक्त कथा द्वारा सब सन्तापो के निवृत्त होने पर विबोधरूप सूर्य के आविर्भूत होने पर राजा विदूरथ चित्त के परमात्मा में विलीन होने से जड़ (अनुसन्धानरहित) यानी मरण के लिए मुर्छित हो गया