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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 59–60

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verses 59–60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 59,60

संस्कृत श्लोक

विदोन्तःस्थावरादेर्यास्तस्या बुद्ध्यास्तथा स्थितेः । अन्याभिधानास्थानार्थाः संकेतैरपरैः स्थिताः ॥ ५९ ॥ कृमिकीटपतङ्गानां या नामान्तःस्वसंविदः । तान्येव तेषां बुद्ध्यादीन्यभिधार्थानि कानिचित् ॥ ६० ॥

हिन्दी अर्थ

प्रत्यक्‌ चैतन्य ही उक्त स्थावर, आदि बुद्धि के "मेँ स्थावर हूँ” यों व्यवस्थित रूप से अन्दर रहने के कारण “हम जंगम पदार्थो से भिन्न यानी स्थावर है" इस कथन और अभिमान के विषय होकर अन्य (वृक्ष, पर्वत आदि) संकेतों से स्थित है। यानी प्रत्यक्‌ू-चैतन्य ही “मेँ स्थावर हूँ” इस वासना से स्थावर नाम आर अभिमान को प्राप्त है । अपनी अपनी आन्तरिक संवित्‌ (प्रत्यक्‌ चैतन्य) ही बुद्धि का रूप धारण करती है, वह बुद्धि ही तत्‌-तत्‌ कृमि, कीट, पतंग आदि विविध अर्थ ओर उनके वाचक शब्दों की कल्पना के भेद रूप से स्थित हे