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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 38–39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verses 38–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 38,39

संस्कृत श्लोक

संसुप्तकरणस्त्वेवं बीजतां यात्यसौ नरे तद्बीजं योनिगलितं गर्भो भवति मातरि ॥ ३८ ॥ स गर्भो जायते लोके पूर्वकर्मानुसारतः । भव्यो भवत्यभव्यो वा बालको ललिताकृतिः ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि किसीको शंका हो तो उस समय उसे अपने व्रीह्मयादिभाव का अनुभव क्यो नहीं होता ? इस पर कहते हैं। उस अवस्था में शरीर न होने से उसकी इन्द्रियाँ और अन्त:करण मूर्छित रहता है । उसी अवस्था में वह पिता के शरीर में भुक्त अन्न द्वारा प्रवेश कर वीर्य बनता है। तदुपरान्त वह माता के उदर मेँ गर्भ बनता है। अपने पूर्वकर्मों के अनुसार सुख, सौभाग्य, आरोग्य और सुन्दर स्वभाव से युक्त अथवा दु:ख, दुर्भाग्य, रोग तथा विषम स्वभाव से युक्त मनोहर आकृतिवाला बालक होता है