Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 49–50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verses 49–50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 49,50
संस्कृत श्लोक
यन्नाम सुषिरं स्थानं देहानां तद्गतोऽनिलः ।
करोत्यङ्गपरिस्पन्दं जीवतीत्युच्यते ततः ॥ ४९ ॥
सर्गादावेवमेवैषा जङ्गमेषु स्थिता स्थितिः ।
चेतना अपि निःस्पन्दास्तेनैते पादपादयः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
जगत्सृष्टि में स्थावर- जंगम विभाग जैसे हुआ, उसमें निमित्त कहती है ।
देहो का जो छिद्र स्थान है, उसमें प्रविष्ट हुआ वायु शरीरों में चेष्टा उत्पन्न करता है,
उससे यह जीता है, ऐसा कहा जाता है । सृष्टि के आदि में ही जंगम प्राणियों में इस प्रकार की
यह स्थिति उत्पन्न हुई, इसी कारण चेतन होते हुए भी वृक्ष आदि चेष्टाशून्य हैं । भाव यह कि
उनमें छिद्र नहीं हे, अतएव वायु उनमें प्रविष्ट हो चेष्टा उत्पन्न नहीं करता, इसलिए वे चेतन
होते हुए भी निश्चेष्ट हैं ।