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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 7–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 7, 8

संस्कृत श्लोक

ततोऽसौ प्रेतशब्देन प्रोच्यते व्यवहारिभिः । चेतनं वासनामिश्रमामोदानिलवत्स्थितम् ॥ ७ ॥ इदं दृश्यं परित्यज्य यदास्ते दर्शनान्तरे । स स्वप्न इव संकल्प इव नानाकृतिस्तदा ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

देह के मरण से ही लौकिक व्यवहार करनेवाले लोग उसे प्रेत कहते हैं । चेतन वासनाओं से युक्त होकर पुष्प आदि की सुगन्ध से मिले हुए वायु के समान रहता है। इस (पूर्वजन्म के) देह आदि दृश्य का त्याग कर अन्य देह आदि के दर्शन में जब रहता है, तब वह जीव स्वप्न की नाई तथा मनोरथ की नाई स्वयं ही परलोकगमन, परलोक, वहाँ के भोग्य आदि वासनामय नाना आकारों को धारण करता है