Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
इयं मे सौम्यसंपाता सरणिः शीतशाद्वला ।
स्निग्धच्छाया सवापीका पुरःसंस्थेति मध्यमः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
मध्यम पुण्यवाले
पुरुष जानते हैँ कि यह मार्ग, जिसमें बडे आनन्द के साथ पैदल चला जा सकता हे, दण्डी
ओर हरी-हरी दूब जमी है, मनभावनी छाया से युक्त है ओर स्थान-स्थान पर बावडियाँ
बनी हैं, मेरे सामने स्थित है