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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 61–62

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verses 61–62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 61,62

संस्कृत श्लोक

यथोत्तराब्धिजनता दक्षिणाब्धिजनं स्थितम् । न किंचिदपि जानाति निजसंवेदनादृते ॥ ६१ ॥ स्वसंज्ञानुभवे लीनास्तथा स्थावरजङ्गमाः । परस्परं यदा सर्वे स्वसंकेतपरायणाः ॥ ६२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे उत्तर सागर के तीर में निवास करनेवाले लोग दक्षिण सागर के किनारे पर रहनेवाले लोगों के विषय में कुछ नहीं जान सकते, वैसे ही प्रत्यकृचैतन्य के बिना किसी भी पदार्थ में सत्ता और स्फूर्ति नहीं आ सकती । ये सब संविद्रूप ही हैं उससे भिन्न नहीं हे । जैसे दक्षिण सागर ओर उत्तर सागर की जनता का दृष्टान्त दिया गया है, वैसे ही सब स्थावर ओर जंगम पदार्थ अपने प्रत्यकृ-साक्षिक अनुभव में लीन हैं अतएव वे अन्य की बुद्धि से कल्पित पदार्थो का ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते | जब वे परस्पर एक दूसरे से व्यवहार करते हैं, तब उन्हे आपस में संकेत की आवश्यकता पडती है