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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 56–57

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verses 56–57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 56, 57

संस्कृत श्लोक

यद्वृक्षाभिधमाबुद्धं स्थावरत्वेन वै पुनः । जडमद्यापि संसिद्धं शिलातरुतृणादि च ॥ ५६ ॥ न तु जाड्यं पृथक्किंचिदस्ति नापि च चेतनम् । नात्र भेदोऽस्ति सर्गादौ सत्तासामान्यकेन च ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

जिन वृक्ष, शिला, पेड़-पौधों, तृण आदि को स्थावररूप से जड़ जाना, वे आज भी वैसे ही स्थित हैं। न तो जड़ कोई पृथक है और न चेतन ही पृथक्‌ है, इस प्रकार तत्‌ पदार्थ का भेद नहीं है, यह भाव हे । इन पदार्थो में उत्पत्ति, स्थिति और नाश में भेद नहीं है, क्योंकि जो वस्तु असत्‌ है, उसमें भेद कैसा ? शंका - जड़ वस्तु में अनुगत जो सद्वस्तु है, उसमें भेद हो । समाधान - सत्तासामान्य में भी भेद नहीं है