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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 24–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 24,25

संस्कृत श्लोक

ये च मध्यमधर्माणो मृतिमोहादनन्तरम् । ते व्योमवायुवलिताः प्रयान्त्योषधिपल्लवम् ॥ २४ ॥ तत्र चारुफलं भुक्त्वा प्रविश्य हृदयं नृणाम् । रेतसामधितिष्ठन्ति गर्भे जातिक्रमोचिते ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

मध्यम धर्मात्माओं की गति कहते हैं। जो मध्यम धर्मात्मा हैं, वे मरणमूर्च्छा के बाद आकाश-वायु से वेष्टित होकर भाँति-भाँति के वृक्ष, लता ओर पल्लवो से व्याप्त नन्दनवन, चैत्ररथ आदि दिव्य उद्यानों में किन्नर, किंपुरुष, यक्ष आदि के शरीर से जाते हैं, वहाँ पर अपने पुण्यकर्मो का सुन्दर फल भोगकर वायु, वृष्टि आदिसे पृथिवी में धान, गेहूँ, जौ आदि में प्रवेशपूर्वक अन्न बनकर ब्राह्मण आदि के हृदय में प्रवेशकर वीर्यरूप से स्त्रियों के गर्भ में प्राप्त होते हैँ