Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 63–65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, verses 63–65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 63-65
संस्कृत श्लोक
यथा शिलान्तःसंस्थानां बहिष्ठानां च वेदनम् ।
असज्जडं च भेकानां मिथोऽन्तस्तस्थुषां तथा ॥ ६३ ॥
सर्वं सर्वगतं चित्तं चिद्व्योम्ना यत्प्रचेतितम् ।
सर्गादौ चोपनं वायुः स इहाद्यापि संस्थितः ॥ ६४ ॥
चेतितं यत्तु सौषिर्यं तन्नभस्तत्र मारुतः ।
स्पन्दात्मेत्यादिसर्गेहाः पदार्थेष्विव चोपनम् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार सच्चित्रूप ब्रह्म में असत्त्व, जाञ्व, वायु, आकाश आदि की कल्पना की भी
उपपत्ति हो सकती है, उसका होना असंभव नहीं है, ऐसा कहते है ।
जैसे पत्थर के मध्य में उत्पन्न हुए मेढक और पत्थर से बाहर स्थित मेढक एक दूसरे
की कल्पना में असत् और जड़ हैं, वैसे ही परस्पर स्थावर पदार्थों में भी समझना चाहिए।
जैसा यह दृष्टान्त है, वैसे ही प्रलयकाल में माया में लीन सर्वात्मक और सर्वगत समष्टि
चित्त, जो कि जगत् की सूक्ष्मावस्थाका रूप है, सर्वप्रत्यक्रूप चिदाकाश से सृष्टि के
आरम्भ में जिस प्रकार स्फुरित हुआ, वह आज भी जैसा-का-तैसा स्थित है। जो स्पन्दनरूप
से स्फुरित हुआ वह वायु है और वह आज भी यहाँ पर स्थित है। जो छिद्ररूप से स्फुरित
हुआ वहा आकाश है, उसमें स्पन्दरूप सर्वक्रियाशक्तिस्वरूप वायु स्थित है। उक्त वायु
से सब पदार्थों की चेष्टाएँ ऐसे होती हैं जैसे कि सुखे हुए तिनके, पत्ते आदि पदार्थों में वायु
से कम्पन होता है