Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 100
निन्यानबेर्वौँ सर्ग समाप्त सोवों सर्ग मन की शक्ति से ब्रह्म की सर्वशक्तिता का तथा एकमात्र अज्ञानसे अद्वितीय ब्रह्म मेँ बन्ध, मोक्ष आदिकी कल्पना का वर्णन ।
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- Verse 1बन्ध ओर मोक्ष की कल्पना मनके अधीन ही है, ऐसा जो पीछे कहा था, उसमें उपपत्ति दिखलातेहै। श्र…
- Verse 2हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे तरंगसत्ता जलकी सत्ता से अतिरिक्त नहीं है ऐसा समझनेवाले पुरुषों क…
- Verse 3हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे जल ओर तरंगमें, जलसत्ता को न देख रहे पुरुष को, भेद प्रतीत होता है…
- Verse 4उपदेश्य, उपदेशक, शब्द, अर्थ आदि शास्त्रीय व्यवहारकी कल्पना भी अज्ञानियों का अवलम्बन करके…
- Verse 5अज्ञात ब्रह्म ही सम्पूर्ण जगत् का कारण है, ज्ञात नहीं, इस आशय से अज्ञात ब्रह्मकी ही सर्व…
- Verse 6भगवान् सर्वशक्तिशाली हैँ, उनको जब जो शक्ति रूचती है, सर्वव्यापी वे उसी शक्तिको कार्यरूप…
- Verses 7–10हे रामचन्द्रजी, जरायुज, अण्डज, स्वेदज ओर उद्भिज्ज-इन चार प्रकार के प्राणियों में ब्रह्म क…
- Verse 11पुरुषोंमें शोकशक्ति, प्रसन्न जीवमें आनन्दशक्ति, योद्धामें वीर्यशक्ति, विविध सृष्टियों में…
- Verse 12ब्रह्म के प्रथम कार्य चित्त में चित्त और जडता दिखाई देने से भी अज्ञात ब्रह्म ही जगत् का…
- Verse 13चूँकि वृक्ष, आडी आदि दृश्य प्रपंच अज्ञातचिद्विवर्त है, अतः एकमात्र चित् ही तत्त्व है, ऐस…
- Verse 14हे श्रीरामचन्द्रजी, अब इस जगत् को ओर “अहम्” रूप से भासित हो रहे जीवतत्त्व को आप ब्रह्मर…
- Verses 15–17ब्रह्म ही तत्-तत् शक्तियों से भ्रान्तिवश मन आदि शब्दों से पुकारा जाता है, वह ब्रह्म से…
- Verse 18यदि कोई शंका करे कि काम, कर्मवासना आदि भी द्वैतप्रपच के हेतु घुने जाते हैं, ऐसी अवस्थे ब्…
- Verse 19यदि कोई शंका करे कि काम आदि मनके धर्म हैं, वे ब्रह्ममे स्थित कैसे हो सकते हैं, जिससे कि व…
- Verse 20यदि सभी मनोधर्म ब्रह्मथक्तियाँ हैं, तो सबका सब जीवों में संमिश्रण क्यो नहीं होता ? इस पर…
- Verse 21जैसे देश, काल आदि की विलक्षणतासे पृथ्वीतल से धान आदि के पौधे उगते हैं वैसे ही ब्रह्म से भ…
- Verses 22–23यह प्रतियोगी, भेद, संख्या, रूप आदिस्वरूप जगत् की विचित्रता कल्पना द्वारा मानकर दशर गई है…
- Verse 24इस मनका जेसा-जैसा प्रतिभास होता है वैसा- वैसा ही यह हो जाता है, इसमें एेन्दव (& ) ब्राह्म…
- Verse 25जैसे निश्चल और निर्मल जलराशिमें अपने-आप स्पन्द (कम्पन) होता है वैसे ही परमात्मा में यह जी…
- Verses 26–28जैसे सागर का जल कल्लोल, लहर और तरंगके रूप मे चारों ओर स्थित रहता है वैसे ही ज्ञानीकी दृष्…
- Verse 29जैसे प्रचंड सूर्य के प्रकाश अपनेमें ही मृगतृष्णारूप से स्फुरित होता है वैसे ही नामरूप रहि…
- Verse 30करण, कर्म, कर्ता, जन्म, मरण, स्थिति, सब ब्रह्म ही है, उसके सिवा कोई दूसरी कल्पना है ही नह…
- Verse 31न लोभ है, न मोह है, न तृष्णा है ओर न अत्यन्त आसक्ति हे । आत्मा में आत्मा का लोभ कैसा अथवा…
- Verses 32–33यह सारा जगत् आत्मा ही है । जो कुछ यह कल्पनाक्रम है, वह सब आत्मा ही है, बहुत क्या कहें, ज…
- Verse 34जैसे बन्धु ही क्यों न हो, यदि यह मेरा बन्धु है, ऐसा ज्ञान न हो तो शीघ्र ही अबन्धु हो जात…
- Verse 35आत्मा ही इस जगत् में अनात्मभूत अहंकार के अभेद से अनात्मा की नाई जीवरूपसे विराजमान है । ज…
- Verse 36व्यामोहजनित बन्ध-मोक्षशब्दार्थदृष्टियों का आत्मा में अत्यन्त असम्भव है, तथा आत्मा सत्य है…
- Verse 37जिसका बन्धन होना कभी सम्भव नहीं हे, उसकी “में वद्ध हूँ” यह कुकल्पना नहीं हे तो ओर क्या है…
- Verse 38क्योकि - न निरोधो न वोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थ…
- Verse 39यौक्तिकद्रष्टि की लौकिकद्रष्टि की दृढ़ता का विघटन करने के लिए परमार्थदृष्टि के द्वाररूप स…
- Verses 40–41पूर्वोक्त रीति से तुच्छ अज्ञानसे ही बन्ध और मोक्षकी दृष्टियाँ उत्पन्न हुई ह । “नाऽसतो विद…
- Verses 42–43हे महामते, जिसकी बुद्धि प्रबुद्ध हे, यानी जो ज्ञानी है, उसके प्रति रज्जुमें सर्पकी कल्पना…