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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 100

निन्यानबेर्वौँ सर्ग समाप्त सोवों सर्ग मन की शक्ति से ब्रह्म की सर्वशक्तिता का तथा एकमात्र अज्ञानसे अद्वितीय ब्रह्म मेँ बन्ध, मोक्ष आदिकी कल्पना का वर्णन ।

32 verse-groups

  1. Verse 1बन्ध ओर मोक्ष की कल्पना मनके अधीन ही है, ऐसा जो पीछे कहा था, उसमें उपपत्ति दिखलातेहै। श्र…
  2. Verse 2हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे तरंगसत्ता जलकी सत्ता से अतिरिक्त नहीं है ऐसा समझनेवाले पुरुषों क…
  3. Verse 3हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे जल ओर तरंगमें, जलसत्ता को न देख रहे पुरुष को, भेद प्रतीत होता है…
  4. Verse 4उपदेश्य, उपदेशक, शब्द, अर्थ आदि शास्त्रीय व्यवहारकी कल्पना भी अज्ञानियों का अवलम्बन करके…
  5. Verse 5अज्ञात ब्रह्म ही सम्पूर्ण जगत्‌ का कारण है, ज्ञात नहीं, इस आशय से अज्ञात ब्रह्मकी ही सर्व…
  6. Verse 6भगवान्‌ सर्वशक्तिशाली हैँ, उनको जब जो शक्ति रूचती है, सर्वव्यापी वे उसी शक्तिको कार्यरूप…
  7. Verses 7–10हे रामचन्द्रजी, जरायुज, अण्डज, स्वेदज ओर उद्भिज्ज-इन चार प्रकार के प्राणियों में ब्रह्म क…
  8. Verse 11पुरुषोंमें शोकशक्ति, प्रसन्न जीवमें आनन्दशक्ति, योद्धामें वीर्यशक्ति, विविध सृष्टियों में…
  9. Verse 12ब्रह्म के प्रथम कार्य चित्त में चित्त और जडता दिखाई देने से भी अज्ञात ब्रह्म ही जगत्‌ का…
  10. Verse 13चूँकि वृक्ष, आडी आदि दृश्य प्रपंच अज्ञातचिद्विवर्त है, अतः एकमात्र चित्‌ ही तत्त्व है, ऐस…
  11. Verse 14हे श्रीरामचन्द्रजी, अब इस जगत्‌ को ओर “अहम्‌” रूप से भासित हो रहे जीवतत्त्व को आप ब्रह्मर…
  12. Verses 15–17ब्रह्म ही तत्‌-तत्‌ शक्तियों से भ्रान्तिवश मन आदि शब्दों से पुकारा जाता है, वह ब्रह्म से…
  13. Verse 18यदि कोई शंका करे कि काम, कर्मवासना आदि भी द्वैतप्रपच के हेतु घुने जाते हैं, ऐसी अवस्थे ब्…
  14. Verse 19यदि कोई शंका करे कि काम आदि मनके धर्म हैं, वे ब्रह्ममे स्थित कैसे हो सकते हैं, जिससे कि व…
  15. Verse 20यदि सभी मनोधर्म ब्रह्मथक्तियाँ हैं, तो सबका सब जीवों में संमिश्रण क्यो नहीं होता ? इस पर…
  16. Verse 21जैसे देश, काल आदि की विलक्षणतासे पृथ्वीतल से धान आदि के पौधे उगते हैं वैसे ही ब्रह्म से भ…
  17. Verses 22–23यह प्रतियोगी, भेद, संख्या, रूप आदिस्वरूप जगत्‌ की विचित्रता कल्पना द्वारा मानकर दशर गई है…
  18. Verse 24इस मनका जेसा-जैसा प्रतिभास होता है वैसा- वैसा ही यह हो जाता है, इसमें एेन्दव (& ) ब्राह्म…
  19. Verse 25जैसे निश्चल और निर्मल जलराशिमें अपने-आप स्पन्द (कम्पन) होता है वैसे ही परमात्मा में यह जी…
  20. Verses 26–28जैसे सागर का जल कल्लोल, लहर और तरंगके रूप मे चारों ओर स्थित रहता है वैसे ही ज्ञानीकी दृष्…
  21. Verse 29जैसे प्रचंड सूर्य के प्रकाश अपनेमें ही मृगतृष्णारूप से स्फुरित होता है वैसे ही नामरूप रहि…
  22. Verse 30करण, कर्म, कर्ता, जन्म, मरण, स्थिति, सब ब्रह्म ही है, उसके सिवा कोई दूसरी कल्पना है ही नह…
  23. Verse 31न लोभ है, न मोह है, न तृष्णा है ओर न अत्यन्त आसक्ति हे । आत्मा में आत्मा का लोभ कैसा अथवा…
  24. Verses 32–33यह सारा जगत्‌ आत्मा ही है । जो कुछ यह कल्पनाक्रम है, वह सब आत्मा ही है, बहुत क्या कहें, ज…
  25. Verse 34जैसे बन्धु ही क्‍यों न हो, यदि यह मेरा बन्धु है, ऐसा ज्ञान न हो तो शीघ्र ही अबन्धु हो जात…
  26. Verse 35आत्मा ही इस जगत्‌ में अनात्मभूत अहंकार के अभेद से अनात्मा की नाई जीवरूपसे विराजमान है । ज…
  27. Verse 36व्यामोहजनित बन्ध-मोक्षशब्दार्थदृष्टियों का आत्मा में अत्यन्त असम्भव है, तथा आत्मा सत्य है…
  28. Verse 37जिसका बन्धन होना कभी सम्भव नहीं हे, उसकी “में वद्ध हूँ” यह कुकल्पना नहीं हे तो ओर क्या है…
  29. Verse 38क्योकि - न निरोधो न वोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थ…
  30. Verse 39यौक्तिकद्रष्टि की लौकिकद्रष्टि की दृढ़ता का विघटन करने के लिए परमार्थदृष्टि के द्वाररूप स…
  31. Verses 40–41पूर्वोक्त रीति से तुच्छ अज्ञानसे ही बन्ध और मोक्षकी दृष्टियाँ उत्पन्न हुई ह । “नाऽसतो विद…
  32. Verses 42–43हे महामते, जिसकी बुद्धि प्रबुद्ध हे, यानी जो ज्ञानी है, उसके प्रति रज्जुमें सर्पकी कल्पना…